साईं बाबा ने माता-पिता के साथ टूर की यात्रा को सफल बनाया- भूषण जी


Sai Baba Took Silent Care All The Way – Sai Devotee Bhushanसे अनुवाद

आज फिर मैं भूषण जी के द्वारा भेजा गया अनुभव प्रस्तुत कर रही हूँ। पहले भी हम उनके द्वारा भेजे गए कुछ अनुभव पढ़ चुके हैं और उन्हें पढ़कर मानो कुछ देर के लिए हमारा ह्रदय रुक सा गया हो। मुझे तो ऐसा ही लगता है ,सचमुच वे साईं बाबा के वरद् पुत्र हैं जिन्हें सदैव बाबा का आशीर्वाद मिलता रहा है। जैसे की हम सभी जानते हैं कि जो भी भक्त शिर्डी जाते है, उनकी देखभाल बाबा स्वयं करते हैं और तब तक करते है जबतक कि भक्त सकुशल अपने गंतव्य तक पहुँच नहीं जाते और उनका यह प्रेम आज भी हमें देखने को मिलता है, जब भी हम शिर्डी जाते हैं ।

साईं बाबा ने कहा था की, “चाहे जहाँ भी जाओ, जो भी करो, किन्तु स्मरण रखो के मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ भले ही तुम सात समुंदर पार ही क्यों न रहो”। नीचे दी हुई घटना में बाबा ने अपने इन्ही शब्दों को सच किया है।




सच्चे साईं भक्त वे हैं जो कि हर ईश्वर में उन्हें ही देखते हैं। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि मैं चाहे किसी भी मंदिर में रहूँ, या किसी भी भगवान के सामने रहूँ, मेरे ह्रदय से एक ही आवाज़ आती है “जय साईं नाथ”। संक्षेप में, बाबा हर जगह विराजमान हैं और इसलिए हमारा ह्रदय उनकी उपस्थिति महसूस कर लेता है। कई बार हम बहुत परेशान और असहज होते है, जिससे हमें लगता है कि बाबा हमारे साथ नहीं हैं । यह हमारी सोच होती है, जबकि बाबा की सोच तो हमारी कल्पना के परे होती है। वे हमेशा हमारी देखभाल कर रहे होते हैं। उनकी उपस्थिति को महसूस करने के लिए किसी विशेष अवसर या किसी कठिन परिस्थिति की आवश्यकता नहीं है। यदि हम ख़ुशी के क्षणों में उन्हें स्मरण करें तो भी वे हमारी “शांत देखभाल” “silent care” करते हैं। इसके बदले में बाबा हम से कुछ नहीं चाहते, केवल प्रेम पूर्वक उनका स्मरण ही पर्याप्त है।

मुझे नहीं लगता कि इससे आसन भक्ति की कोई और विधि है!!! बाबा का प्रेम और ममता पाने के लिए, केवल एक कदम उनकी ओर उठाने की ज़रूरत है और वे हमें ऊँचाइयों पर उठा देते हैं। यदि हम यह विश्वास करने लगें कि हमारे जीवन में जो भी होता है वह बाबा की इच्छा से ही होता है और सब कुछ बाबा ही करते हैं, तब तनाव, परेशानी, डर या चिंता नहीं रहेगी। बाबा की लीलाओं और कृपा का तो कोई अंत नहीं है, लेकिन अब मैं यहाँ रुक कर घटना का वर्णन करती हूँ। नीचे दी गई घटना किसी बड़ी दुर्घटना या बुरे समय का विवरण नहीं है जिससे कि भूषण जी को गुजरना पड़ा, बल्कि यह उनको (और हम सभी के लिए) बाबा का सन्देश था कि “डरने की क्या बात है, जब बाबा हमारे साथ हैं”।

भूषण जी कहते हैं :

हेतल जी

साईं राम….

बहुत समय बाद मै एक और अनुभव के साथ आया हूँ। कृपया अपने विचार और प्रतिक्रिया जरूर दें। साईं का आशीष बना रहे… सभी साईं भक्तों को जय साईं राम, हेतल जी के ब्लॉग के माध्यम से पहले भी मैं 2-3 अनुभव भेज चूका हूँ। आज मैं एक हाल ही में हुआ अनुभव भेज रहा हूँ। वह मेरे लिए बहुत ही तनाव भरा समय था। मैंने बाबा को इस दुविधा और संशय की कठिन परिस्थिति में सहायता के लिए पुकारा। और उन्होंने मेरी भरपूर सहायता की…!!!!

इस वर्ष मेरी कंपनी में मेरा एलटीसी(LT:यानी यात्रा करने के लिए मिला अवकाश) बाकी था। मैं दिवाली की छुट्टियों में अपने पूरे परिवार के साथ कहीं बाहर जाने के लिए उत्सुक था। मैं विशेष रूप से अपने माता-पिता को साथ ले जाना चाहता था। मैं उनके बगैर कभी भी लम्बे समय के लिए बाहर नहीं गया, क्योंकि वे ह्रदय, बीपी और डायबिटीज के मरीज़ हैं। और हमेशा उन्हें मेरी आवश्यकता होती है। इसलिए, मैंने उन्हें साथ ले जाने की योजना बनाई जिससे उनका भी मनोरंजन हो और वे प्रसन्न हो जाये।

एक शाम, मैं टिकट बुक करने ट्रेवल एजेंसी गया, जो कि बड़ोदा की नामी एजेंसी है। साईंनाथ का नाम लेकर, मैंने सभी औपचारिकताए पूर्ण की और कुल्लू-मनाली- शिमला-दिल्ली-जयपुर-श्रीनाथजी (पैकेज टूर) की टिकट बुक कर भुगतान भी कर दिया। लेकिन, बुक करने के बाद से ही मेरे मस्तिष्क में बुरे विचार और दूसरी समस्याओं की चिंताए उत्पन्न हो रही थीं मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है …? रात को बहुत देर तक मैं सो नहीं पाया। अगले ही दिन, मैंने तय किया कि हम इस टूर पर नहीं जायेंगे और ट्रेवल ऑफिस जाकर मैंने टिकट कैंसिल करा दी।

साईं बाबा हमेशा अपने बच्चों की रक्षा करते हैं। किन्तु उनके तरीके अलग हो सकते हैं….

कुछ दिन के बाद, फिर से मुझे विचार आया “मैं क्यों डर रहा हूँ, जब बाबा हमेशा मेरे साथ हैं???” मेरा एलटीसी का समय (2 वर्ष) इस दिसम्बर में समाप्त होनेवाला था। तो मेरे पास कम समय था। मैंने सोचा मुझे अपने माता-पिता के लिए जाना चाहिए। दूसरी ओर उनका स्वास्थ्य भी मेरे लिए चिंता का विषय था । फिर से शाम को, मैं उसी ट्रेवल ऑफिस गया और किसी दुसरे टूर के लिए पूछताछ की, जो कि मेरे माता-पिता के लिए सही और उपयुक्त हो। उसने टूर प्रोग्राम के 2-3 रूट बताए। मैंने उत्तर भारत का टूर फाइनल किया जिसमे निम्न जगहों के दर्शन शामिल थे-

श्रीनाथजी- श्री कृष्ण भगवान दर्शन

दिल्ली- अक्षरधाम – श्री अक्षर-पुरुषोत्तम स्वामिनारायण दर्शन

हरिद्वार+ऋषिकेश – गंगा जी आरती दर्शन- गंगा स्नान

अयोध्या- श्री राम जन्म भूमि दर्शन

वाराणसी(काशी) – श्री काशी विश्वनाथ महादेवजी दर्शन

अलाहाबाद- त्रिवेणी संगम- प्रयागराज दर्शन

आगरा- विश्व प्रसिद्ध ताज महल और श्री राधा-स्वामी मंदिर दर्शन

गोकुल-मथुरा-वृन्दावन- श्री कृष्ण जन्म+लीला भूमि दर्शन

पुष्कर- श्री ब्रह्मा जी मंदिर दर्शन

और फिर बड़ोदा वापसी (जो की कुल 12 दिन का टूर था)। शायद बाबा हमें अपने उन स्थलों पर हमे ले जाना चाहते थे … अनेकों रूप हैं उनके!!!

मैंने यह सूचना अपने सभी रिश्तेदारों,मित्रों और सहकर्मियों को दे दी। मैंने अपने कंपनी में भी एलटीसी टूर सम्बन्धी सभी औपचारिकतायें पूरी कर लीं। तब जाकर साब कुछ तय हुआ और हम सभी बहुत खुश थे। हमने सारी तैयारी भी शुरू कर दी।

मेरे पिता जी ह्रदय के मरीज हैं और उनको पहले 2 हृदयाघात हो चुके हैं। हमें नियमित जाँच के लिए जाना होता है और डॉक्टर के संपर्क में ही रहना होता है। कुछ दिन पहले हमने डॉक्टर से बात की थी कि हम दो सप्ताह के लिए टूर पर जाने के इच्छुक हैं और उसी की योजना भी बना रहे हैं। शायद उन्होंने इसे हलके में ले लिया था और हमें कहा “ठीक है आप लोग जा सकते हैं लेकिन थोडा ध्यान रखियेगा…”

उसी के आधार पर हमने योजना बना ली । हमारी यात्रा के एक दिन पहले हम 06.11.2008 को जांच के लिए उन्हें ले गए। नियमित जांच हुई। कई टेस्ट लिए गए। और उनकी सेहत संतोषजनक थी। सभी औपचारिकताओं और भुगतान के बाद मैंने डॉक्टर को बताया कि अगले दिन हम टूर प्रोग्राम पर जा रहे हैं। उन्होंने सब कुछ सुना और बोले “यह तो इनके लिए बहुत मुश्किल होगा। मुझे नहीं लगता कि इनको इतनी परेशानी उठानी चाहिए!!! यह इनकी सेहत को बुरी तरह ख़राब कर सकता है !!!!!” मैंने उनसे पूछा” अब क्या करें सर? “ तब उन्होंने कहा” कायदे से तो इनको नहीं जाना चाहिए!!!”

अब परिस्थिति मेरे लिए बोहुत चिंता जनक बन गयी । बुकिंग, सामान और हम, सब कुछ तैयार था और कुछ ही घंटों में स्थिति बिलकुल बदल गई!!! यदि मैं उन्हें अभी नहीं ले जाता, और भविष्य में कोई दुर्घटना घट गई तो मुझे सारी ज़िन्दगी हमेशा पछतावा रहेगा कि उनकी ये इच्छा मैं पूरी नहीं कर सका। और यदि मैं उन्हें ले जाता हूँ, तो डॉक्टर की सलाह और उनकी सेहत ख़राब होने का संदेह मुझे विचलित कर देगा!! यदि रास्ते में कोई दुर्घटना घट गई तो हमारे लिए बहुत ही परेशानी हो जाएगी ।

इसके अलावा, सारे समाज के लोगों को मौका मिल जायेगा और कहेंगे “यह बहुत बड़ी बेवकूफी थी। उन्हें नहीं ले जाना था। दुनिया क्या कहेगी? लोग क्या सोचेंगे?
मेरे माता-पिता के प्रति मेरी भावनाओं को कोई भी नहीं समझेगा।

अब क्या करें? क्या करें? क्या करें??? यह सचमुच मेरे लिए शोचनीय स्थिति थी।

मैं कोई भी निर्णय नहीं ले पा रहा था … और फिर मैंने बाबा की शरण ली और उनसे कहा मेरे आसपास आपकी उपस्थिति का एहसास हर क्षण चाहिए मुझे बाबा… बाबा कृपया मुझे सही राह दिखाओ…आखिर मुझे अपने श्री साईं नाथ को पुकारते हुए रोना आ गया। जब कोई नहीं आता, मेरे साईं आते हैं… मेरे दुःख के दिनों में वो बड़े काम आते हैं..।
यदि हम जाएँ तो कुछ बुरा हो सकता था…और नहीं जाए तो जीवन भर का अफ़सोस रहेगा…

जाएँ तो जाएँ कहाँ !!!???!!! कुछ तो करना ही पड़ेगा न ??? कल्पना कीजिये कि आपके एक तरफ कुआं है और दूसरी तरफ खाई!!! आप क्या करेंगे??

तब मैंने निर्णय ले लिया। और मैंने यह निर्णय अपने सभी परिवार जनों की सलाह से लम्बे सोच-विचार के बाद लिया। सब कुछ बाबा पर छोड़कर, मैंने आगे बढ़ने का निश्चय किया….
मस्तिष्क शांत और हल्का था। किन्तु यह शांति अस्थाई थी। जब हम यात्रा पर 07.11.2008 को सुबह 8.45 बजे, रवाना हो रहे थे, तब एक नई परेशानी आई। वहां पहुँचने पर पता चला कि 2 X 2 डीलक्स बस रद्द हो गई है उसकी जगह 3 X 2 बस जायेगी !!! हे भगवान!!! फिर से विचारणीय स्थिति??! लेकिन सुरक्षा के लिए सिवाय बाबा के नाम लेने के हमारे लिए कोई भी विकल्प नहीं था (3X2 बस की तुलना में 2X2 बस लम्बी यात्रा के लिए हमेशा बेहतर और आरामदायक होती है) ह्रदय और मन में बाबा से प्रार्थना करते हुए,
आखिर हम सभी ने 7 नवंबर 2008 को यात्रा आरंभ की, हर एक के ह्रदय में लगातार बाबा का ही नाम था।

हर क्षण मुझे लग रहा था कि बाबा मेरे साथ हैं!!! सारी व्यवस्थाएं पूर्णतः अच्छी और आरामदेह थीं…हम सभी स्थानों पर गए, दर्शन किये, प्रार्थना की और बहुत आनंद लिया…!!
12 दिनों के बाद…मैं आप सभी को बताते हुए बहुत खुश हूँ कि हम सफलता पूर्वक लौट आये । कुछ जगह यात्रा में थोड़ी थकान हुई उसके अलावा कोई चिंता की बात नहीं थी। हम बड़ोदा में (18 की देर रात) को लौट आये, आँखों में आँसू थे और मन में ढेर सारे विचार कि आखिर हम क्यों चिंतित थे?? जब बाबा हमारी सुन रहे थे!!! हम ये क्यों भूल गये कि उनके ही तो दर्शन किये थे हमने हर जगह, फिर कैसे कोई मुसीबत आ सकती है???

काशी-मथुरा-काबा तुझमें..सब कुछ साईं बाबा तुझमें

साईं ने मेरी लाज रखी!!!

कोटि कोटि प्रणाम मेरे मालिक!!! साईं तेरा हाथ सदा मेरे सर पे रहे, बाकि जीवन में कुछ साथ रहे न रहे!! इसे पूरा पढने के बाद आप सोच रहे होंगे कि इसमें क्या है? यह कोई बड़ी बात नहीं!! लेकिन मेरे लिए, यह एक चमत्कार था…. यह साईं महाराज की एक बहुत महान लीला थी। क्योंकि मुझे उस बड़े जोखिम और असामान्यता का अंदाजा था जो की बाबा ने शायद टाल दिया।

कृपालु साईं बाबा की कृपा और आशीर्वाद हम सभी पर और हमारे परिवार पर सदा बरसता रहे और हमारी सभी परेशानियाँ और चिंताएं वे दूर करें और हमें सदा मन की शांति, शक्ति, सफलता, और ख़ुशी प्रदान करें। साईं नाथ सब पर कृपा करें।

सब का मंगल हो… जय साईं नाथ

साईं को प्रणाम

सब को शांति मिले

भूषण ढोलकिया

ॐ साईं राम

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इस कहानी का ऑडियो सुनें

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Translated and Narrated By Rinki
Transliterated By Supriya

© Sai Teri LeelaMember of SaiYugNetwork.com

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