Friday, February 7, 2020

साईं भक्त नताशा: बाबा जीवन के हर पहलू में मौजूद हैं

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साईं भक्त नताशा कहती है: प्रिय हेतलजी, मेरा नाम नताशा है और मैं अपनी शुरुआती किशोरावस्था से ही बाबा को मानती थी। मैं अक्सर श्री साईं सच्चचरित्र पढ़ती थी और एक दिन मैंने यह सोचा की देखती हूँ की कोई बाबाजी का चमत्कार हैं क्या जिन्हें लोगों ने हाल ही में अनुभव किया हो। इस प्रकार, गूगल से, मैं आपके ब्लॉग तक पहुंची जिसके द्वारा मुझे पता चला की भले ही वह शारीरिक रूप से मौजूद नहीं है फिर भी वे अपने भक्तो के कल्याण के लिए बहुत सक्रिय है।

सभी साईं भक्तों के अनुभवों को पढ़ने के बाद मुझे काफी सुकून है, इसीलिए मैंने अपना भी अनुभव साँझा करना चाहती हूँ की किस प्रकार बाबा ने अप्रत्याशित रूप से मेरी परेशानी से मुझे बहार निकला। यह एक छोटा अनुभव है परन्तु फिर भी इससे साईं बाबा की भव्यता को महसूस किया जा सकता है। जैसे-जैसे मुझे याद आते जाएंगी मैं उन्हें लिखती जाउंगी। यदि आपको यह ठीक लगे तो कृपया इसे पोस्ट करें। इस अद्भुत ब्लॉग के लिए धन्यवाद। बाबा की लीलाओं को पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है।

अनुभव दिनांक: मार्च 2000

वर्ष 1997 में मेरे नाना जी द्वारा बाबा के बारे में मुझे पहली बार पता चला। वे हर गुरूवार को बाबा के मंदिर जाते और मैं अपनी दसवीं के बोर्ड्स की परीक्षा में अच्छा करूं यह प्रार्थना करते थे। बाबा के आशीर्वाद से सब अच्छे से हो गया और मैं भी उनकी कृपा की छाया में प्रवेश होने लगी। मैं अपने डिग्री के पहले वर्ष में बहुत शरारती थी| एक दिन प्रिंसिपल ने मुझे क्लास बंक करते हुए पकड़ लिया। इसके बाद कॉलेज में मेरी गणना उन लोगो में होने लगी जिनको पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं होती । अब बारी आती है अंतिम परीक्षा की। मेरा पाठ्यक्रम में दो भाग थे जहां कॉलेज छात्र को उनकी पढाई और व्यवहार के अनुसार 25 में से अंक देते है और विश्वविद्यालय की परीक्षा में प्रति विषय के 75 अंक होते है जो कुल 100 अंक प्रति विषय बनाता है।तो मेरी प्रतिष्ठा जो बिगड़ गयी थी उसके अनुसार मेरे शिक्षकों ने सोचा कि मैं अच्छीनहीं हूं और वास्तव में मुझे मेरी योग्यता से कम अंक मिले। इस कारन मैं थोड़ा परेशान भी थी लेकिन फिर मैंने सोचा की विश्वविद्यालय की परीक्षा तो अभी भी लिखनी बाकी है| एक दिन पढाई करते समय मैंने बाबा के चित्र को देखा और पूरे मन से कहा, "यह तो ठीक नहीं है। अनावश्यक हे इसके कारन मेरे औसत अंक कम आएंगे और यह कारन सच भी नहीं है जो शिक्षक मेरे बारे में सोचते है। मेरी प्रतिष्ठा बहुत ही खराब हो गयी है अब इसे कैसे ठीक किया जाए"| मैं वास्तव में भीतर से बहुत ही निराश थी। अचानक मुझे एक आवाज सुनाई दी, मुझे नहीं पता कि यह मेरे भीतर से या बाहर से थी और यह कहा गया की, "तुम्हे पहले स्थान पर आना हैं या दूसरे स्थान पर" मैंने हँसते हुए कहा कि ऐसा हो ही नहीं सकता! फिर से वही प्रश्न पूछा गया।" मैंने कहा, "पहले... नहीं नहीं... दूसरे... मैं नहीं जानती आप ही निर्णय लीजिये की आपको क्या देना हैं" फिर मैंने इस बात को वही पर छोड़ दिया और इसके बारे में भूल गयी|

मैंने अपनी परीक्षा दी| छुट्टियों के बाद दूसरे वर्ष के बैचलर्स की पढाई के लिए कॉलेज शुरू हुआ। जब मैं छुट्टियों के बाद पहले दिन गयी, तो सभी लड़किया मेरी तरफ देखकर कुछ फुसफुसा रही थी। मुझे कुछ अजीब लगा, फिर मेरा सबसे अच्छा दोस्त किरण आया और उसने मुझे बताया कि स्कूल और विश्वविद्यालय के ग्रेडिंग से अंक जोड़े जाने पर मैं पूरे कॉलेज में एक अंक के फर्क से दूसरे स्थान पर आयी हूं। उस समय मैं पूरी निस्तब्ध हो गयी। मुझे वह आवाज की याद आई जिस ने मुझसे पूछा था कि मैं "पहला स्थान या दूसरा स्थान" क्या चाहती हूँ? फिर मैंने वह उनपर छोड़ दिया था। तब मुझे एहसास हुआ कि वह बाबा ही थे और वास्तव में उन्होंने ही मुझे पूछा था। चीजें फिर बदलती गयी कॉलेज में। बाबा ने कॉलेज में मेरी प्रतिष्ठा को बचाया और वास्तव में मेरे शिक्षक और कॉलेज के सभी सहपाठी मेरा सम्मान करने लगे और मेरी तरफ उनका नजरिया भी बदल गया। कई लोगों को यह छोटी घटना लग सकती है लेकिन मेरे लिए यह एक मेरा ऐसा पहला अनुभव था जब मेरे बाबा ने मेरी आतंरिक इच्छा का स्वयं उत्तर दिया।

अनुभव दिनांक: अगस्त 2008

मैं बोस्टन (अमेरिका) में रहती हूं और जब शरद ऋतु (अगस्त-अक्टूबर) आती है तो बहुत सारे सूखे पत्ते हमारे घर के पास गिरते हैं और उसे हमें बैग में इकठ्ठा करके फेकना पड़ता है। मेरे पति सामान्य रूप से ऐसा करते हैं लेकिन वह पांच सप्ताह के लिए देश से बाहर गए थे। आप में से जो लोग नहीं जानते हैं, उन्हें मैं बताना चाहूंगी की (यू.एस) में जिनके घर सड़क के किनारे होते हैं, वे लोग इस चीज़ का विशेष ध्यान रखते हैं कि उनके घर स्वच्छ और अच्छे दिखे। जब मेरे पति शहर से बहार गए हुए थे तो, सूखे पत्तों को इकट्ठा कर के उन्हें बैग में भरकर कचरा फेंकने का काम मुझे करना था| इस कार्य को करने में मुझे बहुत समय लगेगा, लगभग दो से तीन दिन और इस काम को टालते-टालते, मैंने शनिवार दोपहर को यह शुरू किया। मैंने लगातार एक घंटे तक सभी पत्तियों को इकट्ठा करके उन्हें बैग में भरना शुरू किया।

उसके बाद मेरी पीठ में थोड़ा दर्द होने लगा और मैं मन ही मन बड़बड़ाने लगी। उस सप्ताह में, मैंने सत्चरित्र का एक अध्याय पढ़ा था जहाँ बाबा कहते हैं, "जब कोई भक्त अपना अहंकार (अभिमान) त्यागकर मुझे पुकारता है तो मैं उसके घर आकर उसकी सहायता करता हूँ" (मेरी पीठ की दर्द के साथ), इस बात को सोचते हुए मैंने बाबा से कहा की, "मैंने अपना अहंकार त्याग दिया है, आप कहते हो कि आप घर आओगे और मेरी मदद करोगे। अब कहाँ हो आप? यहाँ सिर्फ मैं अकेले ही ये कर रही हूँ"। यह सब मैं बहुत ही असंतोष और संदेह भरी स्वर में बोल रही थी|

लगभग 65 साल या उससे अधिक उम्र की एक पड़ोसी महिला अचानक अपने उपकरण के साथ आई और कहा की उसे भी पत्तियों को इकट्ठा करके उन्हें थैले में डालना है और उन्होंने कहा, "तुम इतनी परेशानी क्यों उठा रही हो, मैं भी तुम्हारी मदद करती हूँ"। उन्होंने मेरी मदद की और अगले एक घंटे में हमने सारे पत्तों को इकठ्ठा करके बैग में भर दिया और काम पूरा हो गया। मैं आपको एक और बात बताती हु, मेरी अपने पड़ोसियों से कुछ खास पहचान नहीं है। कोई भी में मुझे नहीं जानते है क्योंकि मैं पूरी सप्ताह काम के सिलसिले में मुझे यात्रा करनी पड़ती है और इसीलिए सप्ताह अंत में ही मैं घर आती हूँ। वे मेरे पति को जानते हैं लेकिन कोई भी कभी यहां मदद करने के लिए नहीं आए।

इस मामले में मुझे यह बात आश्चर्य जनक लगी की, जिस क्षण मैंने अपना विचार समाप्त किया ठीक उसी समय यह महिला पत्तों को उठाने के सामान के साथ मेरी ओर आयी और उन्होंने इस काम में मेरी मदद की। जब मैंने मेरे पति को बताया कि इस काम में किसी ने मेरी मदद की तब वो हैरान रह गए क्योंकि यहाँ लोगों को अपने घर के ही काफी काम होते हैं, तो वो दूसरों की मदद नहीं कर पाते। बाबा द्वारा कहे गए शब्दों पर अब मेरा संदेह दूर हो गया। बाबा हमेशा अपने वचन निभाते हैं और जैसे ही संदेह पैदा होते हैं वे उन संदेहो को अपने चमत्कारों द्वारा दूर कर देते हैं।


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