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साईं बाबा ने टी.बी से मालनबाई को बचाया

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मालनबाई सतारा जिले में रहती थीं। उनके पिता दामोदर रंगनाथ जोशी का निधन हो गया था और वह अपनी माँ के साथ रहती थीं। उसे बुखार हो गया जो तपेदिक (Tuberculosis) के रूप में विकसित हुआ। जब कोई भी निदान काम नहीं आया, तो उसने साईं बाबा की उदी का सहारा लिया। फिर भी कोई सुधार नहीं हुआ। उसने शिरडी जाने की इच्छा व्यक्त की, इस उम्मीद में कि बाबा के दर्शन करने से उसे बीमारी से छुटकारा मिल जाएगा। उन्हें बाबा पर पूरा विश्वास था कि उनके दर्शन मात्र से दयालु बाबा उनकी बीमारी ठीक कर देंगे ।

शिरडी कैसे पहुंचे यह माँ और बेटी के लिए एक बड़ा सवाल था। दूसरी ओर, वह यात्रा के लिए बहुत कमजोर थी। उसकी माँ अकेले यात्रा का प्रबंधन खुद नहीं कर सकती थी। उसने अपनी बहन और अपने बेटे वासुदेव से मदद मांगी। चारों ने शिरडी में जाकर साईं बाबा के दर्शन किए। मालनबाई को उम्मीद थी कि बाबा के पवित्र चरण के दर्शन मात्र से उनके पिछले और वर्तमान जन्म की तपस्या और बलिदान फलदायी होंगे। इसके विपरीत, मलानबाई को देखकर, बाबा की आँखें जीवित अंगारों से भर उठे। हर पल उनका गुस्सा बढ़ता जा रहा था जैसे कि पहाड़ों की ऊँचाइयों तक पहुँच रहा हो।

जैसे महाभारत में श्री कृष्ण युद्ध क्षेत्र में शंख बजाकर बुराई को नष्ट कर देते हैं, उसी तरह बाबा क्रोधित होकर मुसीबतों और अपने भक्तों की आपदाओं को नष्ट करते हैं। बाबा ने उसकी माँ से कहा, "उसे पानी के अलावा और कुछ मत दो। उसे दीक्षित वाडा में ले जाओ और केवल एक कंबल पर सुला दो"। मलनबाई के स्वास्थ्य के संबंध में एकमात्र आशा थे - बाबा और उनसे ऐसे अजीब निर्देश प्राप्त कर उसकी माँ और मौसी रोना शुरू कर दिये। उन्हें लगा कि उनकी बेटी का भविष्य अंधकार में है, जब उन्हें बाबा से अप्रत्याशित चिकित्सा सलाह मिली। वे उनके पैरों में गिर गए और लड़की की भलाई के लिए भीख मांगने लगे। बाबा के निर्देशों के अनुसार, मालनबाई को दीक्षित वाडा ले जाया गया और अन्य सभी खाद्य पदार्थ रोक दिए गए। उसे केवल एक कंबल पर सुलाया गया। दिन-ब-दिन उसकी हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती गई। उसकी माँ बहुत ही असहाय महसूस करती थी जैसे कोई पेड़ उन पर गिर गया जिसके नीचे वे शरण लेने के लिए आए थे।

14 फरवरी, 1912, सुबह-सुबह बाबा छावड़ी में सो रहे थे। भक्त इकट्ठे हुए, काकड़ आरती की, अन्य मंदिरों में आरती समाप्त हुई, धूप दिन का स्वागत करती दिख रही थी, लेकिन बाबा ने अपनी आँखें नहीं खोलीं। जब वह हमेशा की तरह नहीं उठे तो सभी ग्रामीण दुखी हो गए। यह सभी के लिए अचंभे और निराशा का विषय था।

दीक्षित वाडा से अचानक चीख पुकार सुनाई दी। दो महिलाओ महिलाओ चिल्लाने और गहरे दर्द के साथ रो रही थीं। वे मालनबाई की माँ और मौसी थीं। मालनबाई का निधन हो गया था। उसका मौसेरा भाई अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक सामान खरीदने के लिए गाँव के बाजार गया था। इस बीच बाबा ने चावड़ी में करवट बदल और अपनी आँखें खोलीं। वह फिर से गुस्से में थे और उन्होंने तीन दिशाओं यानी पूर्व, उत्तर और दक्षिण में अपने सटका को घुमाना शुरू कर दिया, जैसे कि वह किसी अदृश्य शक्ति के साथ कुश्ती कर रहें हो। सभी उपस्थित भक्तों को आश्चर्यचकित करते हुए, वे द्वारकामाई नहीं लौटे, लेकिन दीक्षित वाडा की ओर भागना शुरू कर दिया और तीनों दिशाओं में अपने सटका को घुमाते रहे। वह वहीं रुक गए जहाँ मालनबाई को रखा गया था। उसकी सांसें चलने लगीं और वह बहुत डरी हुई लग रही थी। वह उठी और सीधे बाबा के पैरों पर गिर गई और रोने लगी। उसने कहा, "हे माँ, एक काला सा आदमी मुझे दूर ले जा रहा था, इसलिए मैं बाबा के नाम से चिल्लाती थी कि वह मेरी मदद करे। बाबा तुरंत मेरे पास आये और उस काले से आदमी को अपने बल से सटके से मारा और मुझे बचाया। बाद में वह मुझे ले गए छावड़ी में जो काले पत्थरों से बना है”। चूंकि मालनबाई बीमार थी वह शिरडी के किसी भी अन्य स्थानों पर नहीं गई थी, द्वारकामाई और दीक्षित वाडा को छोड़कर। फिर भी उसने छावड़ी का सटीक वर्णन किया।

बाबा अगर चाहते तो उसी दिन मालनबाई को आशीर्वाद दे सकते थे जब वह शिरडी आती थीं और बीमारी को दूर कर सकते थे, लेकिन उन्होंने उसके सभी बुरे कर्मों को दूर करने के लिए उसे थोड़ी और पीड़ा भोगने हेतु नियत किया। ऐसा ही बाबा का अपने भक्तों के प्रति प्रेम था। वह न केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करते है, वह अपने भक्तों के पिछले और वर्तमान जन्म के बुरे कर्मों के प्रभाव को अशक्त बना कर आध्यात्मिक उत्थान के लिए अधिक उत्सुक रहते हैं।

स्रोत: साईं सरोवर से अनुवादित


© Sai Teri Leela - Member of SaiYugNetwork.com

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