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साईं भक्त सुधीर: बाबा की एक और लीला

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साईं भक्त सुधीर कहते है: नमस्ते हेतलजी, पिछले हफ्ते मैंने एक अनुभव लिखा था जो आपके ब्लॉग में प्रकाशित हुआ था। इसका एक हफ्ता नहीं हुआ है और यहाँ एक और बाबा की लीला है, जो उन्होंने मुझ पर बरसाई है। 01-अगस्त–2009 को, पूरे दिन, मैं एक तेलुगु पुस्तक पढ़ता रहा, जिसे "शिरडी साईं अनुग्रहा सेवा रहस्याम" कहा जाता है, जो कि तत्वदर्शी श्री रामानंद महर्षिजी द्वारा लिखित है। यह एक अद्भुत पुस्तक है जिसके अंदर अनमोल आध्यात्मिक रत्न हैं। मैंने किताब का आधा हिस्सा पूरा कर लिया था और शाम को पता नहीं क्यों मुझे भगवान श्री शिव पर एक भक्तिपूर्ण तेलुगु फिल्म "श्री मंजुनाथा" देखने की तीव्र इच्छा हुई। मैंने साईं बाबा से प्रार्थना की और विभिन्न वीडियो लाइब्रेरी में इस वीसीडी को खोजने के लिए निकला। लेकिन चूंकि यह फिल्म वर्ष 2001 में रिलीज़ हुई थी और समय बीत चुका था, इसलिए यह दुकानों में उपलब्ध नहीं थी। दुखी हो कर, मैं घर लौट आया। फिर मैंने नेट के माध्यम से यह देखने के लिए पूरी तरह से खोजा कि क्या यह उपलब्ध है लेकिन मैं केवल वीडियो गाने ही पा सकता था। शंकर महादेवन द्वारा गाया गया एक गीत "ओम महाप्राण दीपम शिवम ..." मेरे मन को छू गया। मैंने इस गाने को लगभग 10 बार लगातार देखा और सोने चला गया। मुझे हमेशा लगता है कि बाबा मेरे हर कदम के बारे में अच्छी तरह जानते हैं, क्योंकि मेरे सारे विचार सिर्फ उनके बारे में रहता हैं। मुझे बाबा को दिल से चाहता हूँ। मैंने कई अनुभवों के माध्यम से महसूस किया कि बाबा हर दिल के निवासी हैं - हृदय निवासी। वह सर्व व्यापी है - हमारे भीतर, हमारे बाहर, हमारे ऊपर और हमारे नीचे हर जगह उपस्थिति है। वह हर स्थान और समय के परे है। ये उसके लिए बिलकुल अड़चन नहीं हैं। अगले दिन (02-अगस्त -2009 रविवार) जब मैंने टीवी शुरू किया तो मैंने देखा कि "श्री मंजुनाथा" को टेलीविजन पर चैनल- Etv पर दिखाया जा रहा है। मैं कितना खुश था। मेरे आँखों से आँसू आगए और मैंने इस हर एक बूंद को बाबा के चरण कमलों को समर्पित कर दिया। बाबा ने मेरे फिल्म देखने के लिए इस फिल्म को प्रसारित करने की व्यवस्था की और वह भी दुनिया के बहुत सारे लोगों द्वारा देखी जाने के लिए। मैंने महसूस किया कि बाबा ने मेरी हर प्रार्थना का जवाब देना शुरू कर दिया। उन्होंने मेरे जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है। यह मेरे भीतर, मेरे और तरफ, हर जगह उनकी उपस्थिति की पुष्टि है।

इस पुस्तक में तत्त्वदर्शी श्री रामानंद महर्षि कहते हैं, "आध्यात्मिक जीवन में, प्रत्येक मनुष्य जो आध्यात्मिक जिंदगी में इच्छुक होगा, दो चीजों से प्रभावित होगा। एक ईश्वर है और दूसरा गुरु है। मनुष्य को इन दोनों की सेवा करनी होगी। कई जन्मों में संचित कर्म के कारण, भगवान की कृपा प्राप्त होगी। भगवान की कृपा से आपको एक गुरु मिलेगा।

एक साधारण सादृश्य से अगर दोनों को अलग से देखा जाए - भगवान एक पिता की तरह है और गुरु एक पति की तरह है। शिशु के जन्म से लेकर विवाह तक बेटी की देखभाल करना पिता की जिम्मेदारी है। जिस क्षण पिता बेटी का कन्यादान / विवाह करता है, वह बेटी की देखभाल करने के लिए पति को दे देता है। बेटी को अपने जीवन का पहला हिस्सा अपने पिता के घर में और अगला हिस्सा पति के घर में बिताना होगा। इसी तरह, प्रत्येक भक्त विभिन्न जन्मों में भगवान के प्रति विश्वास विकसित करता है। परीक्षण के क्षणों में भगवान ही है जो खड़े होकर भक्त का समर्थन करेगा और बचाएगा। लेकिन जिस क्षण आध्यात्मिक खोज किसी भक्त के दिल को छू जाता है और जब भक्त के मन में वास्तविक सत्य को जानने की इच्छा होती है और आध्यात्मिक यात्रा करने और अनुभव करने की तीव्र इच्छा पैदा होती है, उस वक्त भगवान भक्त को गुरु के हवाले कर देते हैं। भक्त की सुरक्षा, जिम्मेदारी और उसे आगे लेजाने के लिए। जब इस तरह की आज्ञा भगवान से गुरु के पास आता है, तो गुरु बिना किसी प्रयास के भक्त के संपर्क में आएगा या तो दर्शन, ध्यान या व्यक्ति के माध्यम से आएगा। जब भक्त गुरु को इस तरह से पाता है, तो उसे भगवान की तुलना में अपनी सेवा और प्रार्थना गुरु से अधिक महत्वपूर्ण रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। जिसने भगवान को, गुरु को खोजने से पहले प्रार्थना करता था अब गुरु में भगवान को देखता था। मेरे गुरु, श्री सद्गुरु श्री साईनाथ के चरण कमलों में, सुधीर कुमार पिसाय।

जय साईं राम


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