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साईं भक्त रंजिनी: शिरडी में साईं बाबा ने प्रार्थनाएँ स्वीकार कीं

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यह अनुभव साईं बहन रंजिनी का है जिन्होंने साईं बाबा से प्रार्थना की थी कि बाबा उन्हें शिर्डी में सेवा में भाग लेने की अनुमति दे।
साई राम बहनों और भाइयों,

मैं इस अवसर पर अपने सबसे प्यारे भगवान साइ बाबा को धन्यवाद देती हूँ । उन्होंने मुझे और मेरे परिवार को 31 जनवरी और 1 फरवरी 2009 को दिव्य दर्शन दिया। अब मैं आपको इस अद्भुत अनुभव के बारे मे बताती हूं।




मैंने शुक्रवार शाम 6.30 बजे आखिरी प्रिंटआउट लिया और बाबा से प्रार्थना की कि हमें उनके अच्छे दर्शन मिलें। इससे पहले ही हमारे भगवान ने, 19 जनवरी को एक भक्त द्वारा लिए गए पत्र के माध्यम से, मेरी प्रार्थनाओं का जवाब दिया था, जिसमें मैंने प्रार्थना की थी कि मैं भी बाबा के शरण मे पत्र रखने की सेवा करना चाहूँगी और हमारी यात्रा सुरक्षित रूप से हो। अब आप देखें कि बाबा प्रत्येक इच्छा को कैसे पूरा करते हैं।

हमने शनिवार को अपनी यात्रा शुरू की। मेरा दिन विष्णु सहस्त्रनामम सीडी के साथ 5.30 बजे शुरू हुआ (बाबा ने साईं सच्चरित्र में विष्णु सहस्त्रनाम के साथ शमा को आशीर्वाद दिया) और फिर हम सुबह 7 बजे निकल पड़े । मैंने भगवान गणेश को अपनी प्रार्थना अर्पित की और भगवान गणेश से संबंधित कुछ मंत्र भी सुने। उसके बाद मैंने अपने आईपॉड में साई अमृतवाणी (बाबा ने अन्य गीतों को सुनने के बजाय आईपोड में अमृतवाणी को बजाने के लिए पहले मेरे मन में निर्देश दिया था!) को सुना, और मुझे साईं अमृतवाणी पढ़ने का बेहतरीन अवसर मिला। बाबा की कृपा से हम दोपहर 1 बजे शिरडी पहुँचे। इससे पहले हम इतनी जल्दी कभी नहीं पहुंचे थे । मेरे पति वास्तव में खुश थे कि हम अपेक्षित समय से पहले ही पहुँच चुके थे ।

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आप याद कर सकते हैं कि जब मैंने प्रार्थना की थी और बाबा ने मुझे अपनी आंतरिक दृष्टि के माध्यम से दर्शन दिया था तब बाबा बैंगनी रंग का पोशाक पहने हुए थे। और आश्चर्य की बात है कि शिरडी मे हम जिस होटल में रुके हुए थे, वहां बाबा एक बैंगनी रंग के पोशाक मे थे। तो यह उत्साह की शुरुआत थी, मेरा दिल जोर से धड़क रहा था और जैसे साईं सच्चरित्र में भक्तों का दिल अपने प्रभु के दर्शन के लिए तड़पता है उसी तरह मैं अपने पति से जल्दी दर्शन करने का आग्रह कर रही थी।

जब मेरे परिवार वाले होटल में कुछ घंटों के लिए आराम कर रहे थे तो मैं साईं सच्चरित्र पढ़ रही थी और बाबा से एक अच्छे दर्शन के लिए प्रार्थना कर रही थी। हम शाम 4 बजे मंदिर गए। मंदिर के गेट पर केवल एक आदमी था जो जूतों को रखने की सेवा कर रहा था, क्योंकि भीड़ थी वह जूतों को लेने के लिए हमारे पास आया और हमें एक प्रसाद की थाली दी। उन्होंने हमें बताया कि हम अपनी माँ को वरिष्ठ नागरिक होने के नाते उन्हें वरिष्ठ नागरिक द्वार से अपने साथ ले जा सकते हैं ।

मेरी सास, मां, पति और मैं (हम चार) थे, इसलिए मेरे पति ने अपनी मां और मैंने अपनी मां को वरिष्ठ नागरिक द्वार से ले गए । सचमुच मेरी माँ हँस रही थी और कह रही थी, "बाबा सब कुछ सुन रहे हैं।" आइए देखें कि दर्शन कैसे हुए।

मैं अपने साथ प्रार्थनाओं का प्रिंटआउट ले गई थी। जब हम सिर्फ समाधि मंदिर के मुख्य द्वार पर (उस स्थान पर पहुँचे जहाँ लाइन बाबा की समाधि के साथ मिलती है), वहाँ मैंने एक सुरक्षा गार्ड से पूछा कि वरिष्ठ नागरिकों की लाइन कहाँ है और उसने हमे एक रास्ते से जाने को कहा जो हमें सीधे अंदर ले गया। उसने एक गेट को खोला और मुझे, माँ, सास और पति को मंदिर में जाने की अनुमति दी !! हम सीधे गए और समाधि मंदिर के लाइन में विलीन हो गए। हम सब ने बाबा की कृपा और प्यार का शुक्रिया अदा किया। बाबा ने मुझे बाएं हाथ की रेलिंग पर चलने के का अवसर दिया ताकि मैं बाबा को स्पष्ट रूप से देख सकुं। मेरी माँ मेरे पीछे थी। तब मैंने वहां मौजूद सुरक्षा गार्ड से अनुरोध किया कि क्या वह बाबा की समाधि पर इन सभी प्रार्थनाओं को रख दें क्योंकि मुझे पहुँचने मे देर होगी। उन्होंने मुझे आश्वासन दिया और मुझे स्वयं रखने के लिए कहा और कहा की बाबा अनुमति देंगे। बाबा ने समाधि तक पहुँचने तक हमारी निगरानी रखी। मैं अपने साथ अपनी साईं सच्चरित्र ले गई थी और मैंने तुरंत ही अपने भगवान से प्रार्थना करी कि इस पुस्तक को भी आशीर्वाद दें ताकि मुझे उस उपदेश की प्राप्ति हो जो वो मुझे इस किताब के द्वारा देना चाहते थे। मैंने अपनी जीवन में अधात्मिकता इस किताब में लिखी कहानियो के द्वारा ही प्राप्त की है।

हम समाधि के पास पहुँचे जहाँ मैंने प्रार्थना की और मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे और बाबा ने पत्रों और साईं सच्चरित्र को आशीर्वाद देकर पुजारी के माध्यम से दोनों चीजें वापस दे दी। तब सुरक्षा गार्ड ने हमें बीच में रुकने की इजाजत दी और हम बाबा के अच्छे दर्शन कर पाए ।

मैंने आत्मीय नमस्कार किया और खुद को आत्मसमर्पण कर दिया और अपने भगवान को अद्भुत दर्शन के लिए धन्यवाद दिया । मैंने सुरक्षा गार्ड को भी धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, "आशा है कि आपकी दर्शन अच्छे हुए।" और हम जिस तरह से अंदर गए थे उसी तरीके से बाहर आए! हम मंदिर के सामने रुके (जहाँ हम मुख दर्शन कर सकते हैं) और शाम 6.30 बजे तक आरती में भाग लिया।

चावड़ी और द्वारकामाई भोग और प्रार्थना की स्वीकृति

मैं अभी भी दर्शन और आरती के आनंद में डूबी हुई थी और सोच रही थी कि भीड़ में हमारे बुजुर्गों को द्वारकामाई कैसे ले जाया जाए। हालाँकि शनिवार का दिन था, और इतनी भीड़ नहीं थी पर मेरी सास बहुत ज्यादा नहीं चल पा रही थी और पहले से ही बैठ कर इंतजार कर रही थी। इसलिए मैंने चावड़ी में प्रार्थनाएँ कीं और प्रार्थना पत्रों को वहाँ रखा और बाबा से प्रार्थना की कि वे सभी प्रार्थनाएँ स्वीकार करें। उसके बाद मैं द्वारकामाई गई और यहाँ भी मैं अपनी सास को भी अपने साथ ले गई थी और सुरक्षाकर्मी से विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि हमें सीधे द्वारकामाई में प्रवेश करने की अनुमति देदें क्योंकि वे कतारों में चल नही सकती। सुरक्षा कर्मी ने कहा कि हम थोड़ी दूर पर खड़े होकर दर्शन करें। जब हम चलने लगे और धूनी और द्वारकामाई के सामने खड़े हो गए, तो मैंने एक और सुरक्षा गार्ड से अनुरोध किया कि वे इन प्रार्थना पत्रों को प्रभु के चरणों में रखें। मैंने कहा, "मुझे अंदर जाने की अनुमति नहीं है, क्या आप यह उपकार कर सकते हैं?" मुझे लगता है कि यह बाबा की लीला थी। उन्होंने कहा, "बाबा को भोग (भोजन का प्रसाद) चड़ा रहे हैं और इसलिए द्वार बंद है। हम आपको विशेष रूप से प्रार्थना पत्रों को रखने की अनुमति देंगे, चिंता न करें, बस 10 मिनट के लिए यहां प्रतीक्षा करें"।

मैं वास्तव में हैरान थी। मैंने अपनी माँ और अपने पति को फोन किया, लेकिन दुर्भाग्य से मेरे पति को मेरी बात समझ में नहीं आई, इसलिए उन्होंने बाहर खड़े होकर मेरी माँ को मेरे साथ भेज दिया। कुछ ही मिनटों मे बाबा की कृपा से हमे अनुमति मिली। हम तीन द्वारकामाई के केंद्र में खड़े थे। सुरक्षा गार्ड ने हमें अंदर की एक ओर पिंजरे में जाने की अनुमति दी इसलिए अब हम धूनी के पिंजरे के बाहर खड़े हो गए। हम प्रतीक्षा कर रहे थे और मन्दिर से पूजारी ने आकर बाबा को भोग अर्पित किया। मैं यह देखकर रोमांचित थी और अपने मन में बाबा को धन्यवाद दे रही थी। उन्होंने भोग का एक हिस्सा धूनी में डाल दिया और धूनी दरवाजे को बंद कर दिया। हर पूजा के बाद भोग चढ़ाया जाता है और भगवान इतने दयालु हैं कि हमें उस प्रसाद का एक छोटा टुकड़ा भी मिला। साईं सच्चरित्र कथाएँ पढ़ने के बाद भक्तो को मालूम होता है कि कैसे बाबा स्वयं भोजन बनाते थे और अपने सभी भक्तों को प्रसाद के रूप में देते थे। मुझे वैसा ही लगा। तब सुरक्षा गार्ड ने मुझे पहले अंदर जाने की अनुमति दी और अच्छे दर्शन करने और पत्र रखने के लिए कहा! एक और भक्त जिसने विशेष पूजा की थी, हमें भी प्रसाद दिया। मैंने बाबा के दिव्य चरण पर अपना सिर रखा और फिर बाबा के चरणों में पत्र रखने के लिए पूजारी को आग्रह किया। उन्होंने हमसे पूछा, "इधर ही रखना है की वापस लेके जाना है?" मैंने कहा, हाँ, इधर ही रखिए, अगर आपकी अनुमति हो तो। बाबा हमसे प्रसन्न हुए और पुजारी जी ने तीन 'काजु कतली" (चीनी और काजू से बनी एक मिठाई) दी। कृपया ध्यान दें कि हम तीन थे और मिठाइयाँ तीन थी। अब उन्हें कैसे पता चला कि हम तीनों हैं! निश्चित रूप से यह बाबा ही थे जिन्होंने इस की ओर इशारा किया था! हमें एक और प्रसाद मिला 'शिरा', (सूजी, चीनी, दूध और ड्राई फ्रूट्स से बनी मीठी प्रसाद)।

इतने दयालु और प्यार करने वाले बाबा हैं। उनका दिल अपने भक्तों के लिए पिघलता है और बाबा की कृपाओं को देखकर मैं स्तब्ध थी और मैं केवल यह कह सकती हूं कि सभी प्रार्थनाएं वास्तव में शक्तिशाली होती हैं और मैं भगवान को शिर्डी बुलाने का धन्यवाद करती हूँ! उन सभी भक्तों के लिए मेरा विनम्र धन्यवाद जिनके कारण हम शिरडी में उस दिन बिना किसी बाधा के जा पाए ।

द्वारकामाई से लौटने के बाद मैंने अपने पति को इस घटने के बारे मे बताया। हमने प्रसाद, फ़ोटो और मेरी सास की कुछ खरीदारी की। मेरी माँ ने बाबा की एक प्यारी मूर्ति देखी, जिसे मैं वास्तव में खरीदना चाहती थी । मैंने सोचा, "वैसे भी हम रविवार तक यहाँ हैं और अगर बाबा इच्छा करते हैं तो मैं इसे कल (1 फेब) को खरीदूँगी।" इसके अलावा मैंने अपनी मौसी और भाभी के लिए दो साईं सच्चरित्र ख़रीदी और सोचा कि मैं उन्हें अगले दिन दर्शन के दौरान बाबा के आशीर्वाद के लिए दूँगी। हम वापस लौट आए और मैंने साईं सच्चरित्र को पढ़ना जारी रखा, फिर सभी कहानियाँ मैंने अपने दिल और दिमाग में अच्छी तरह से पढ़ीं और बाबा के बारे में सोच सोचते हुए सो गई।

अगले दिन सुबह मेरी माँ और मैं सुबह 6 बजे दर्शन के लिए गए। मैंने बाबा के आशीर्वाद के लिए दो साईं सच्चरित्र ली हुई थी। आज सुबह मैंने अपनी माँ को वरिष्ठ नागरिक के कतार से ले जाने की कोशिश की और हमें सीधे समाधि मंदिर में जाने दिया गया, लेकिन एक छोटी सी घटना हो गई। हम उस जगह से गुजरे जहां आप बिना किसी रेलिंग के सहायते से समाधि मंदिर तक पहुँच सकते हैं। इसलिए हम बाबा को आमने सामने देख सकते थे, लेकिन रविवार की भीड़ के कारण समाधि तक पहुँचने में कुछ मिनट लग गए। जब मैं वहाँ पहुंची तो मैंने प्रसाद चढ़ाया और साईं सच्चरित्र भी अर्पित की। अब बाबा की लीला को फिर से देखें। पूजारी ने प्रसाद चड़ाया और प्लास्टिक नीचे गिर गया। जब तक मैं अपने प्रसाद उठाती तब तक किताबें गायब हो गई! मैंने पुजारी से 2-3 बार किताबों के बारे मे पूछा। उन्होंने कहा कि उनके पास कोई किताब नहीं है। पीछे से सुरक्षा कर्मी हमें अन्य भक्तों के लिए जगह बनाने के लिए मजबूर कर रहे थे, लेकिन मैं और कुछ मिनटों के लिए रुकने के लिए जोर दे रही थी क्योंकि मैंने पुजारी जी को किताबें दी थी। पुजारी जी ने कहा 'किधर जयेगा मैं इधार खाड़ा हूं। मुझे नहीं दिया था, और किसी के हाथ मे दिया होगा - यहाँ से किताबें कहाँ जा सकती हैं, माई”। मैंने कहा कि “आपने शायद मुझे किताबें आपको देते हुए नहीं देखा होगा, इसलिए हो सकता है कि आपने उन्हें गलती से किसी दूसरे भक्त को दे दिया हो!” उन्होंने फिर से खोज करने के लिए कहा। मैं बहुत हैरान थी कि मेरे आँखों के सामने बाबा ने किसी ऐसे व्यक्ति को पुस्तक दी, जिसे इसकी आवश्यकता थी। तुरंत दूसरे सुरक्षाकर्मी ने मुझे जगह छोड़ने के लिए कहा और कहा कि अगर किताबें गायब थीं, तो शायद वो नीचे गिर गए होंगी। मैं बाबा का संदेश समझ गई और नमस्कार करने के बाद बाहर आ गाई। बाहर आकार मैं बार-बार किताबों के बारे मे सोचती रही और बार-बार अपनी माँ को बताती रही। फिर मेरी माँ ने कहा, "तुम नई किताब खरीदने की क्षमता रखती हो, चलो नई पुस्तकें अभी ख़रीद लेते हैं। चिंता मत करो, जिन्हें वास्तव में इसे पढ़ने की जरूरत हो किताबें उस के पास चली गई हैं, बाबा ने इसे उनके हाथ तक पहुंचाना सुनिश्चित किया है। चिंता मत करो और अब जाने दो।"

तो इस तरह मैंने इस प्रिय घटना को प्रसाद के रूप में स्वीकार किया कि बाबा ने मुझे आध्यात्मिकता का अभ्यास करने का एक तात्कालिक उदाहरण दिखाया है (जिसे मैंने साईं सच्चरित्र पुस्तक, शामा और विष्णु सहस्रनाम में याद किया है, जहां बाबा रामदासी की पुस्तक को आशीर्वाद देते हैं और जल्दी से शामा को देते हैं!) आह! क्या बाबा की एक लीला है और कितनी चालाकी से वह सभी तार खींचता है।

बाद में मुझे एहसास हुआ कि मैं बाबा के दरबार में पुस्तक की चर्चा करते हुए मूर्ख जैसी खड़ी थी और लापता किताबों के लिए पुजारी और अन्य लोगों से बहस करने के बजाय बाबा से प्रार्थना कर सकती थी! मुझे बस चुपचाप स्वीकार करना चाहिए था और आध्यात्मिक मार्ग में अधिक वृद्धि और प्रगति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए थी। इस साल मुझे दोबारा ऐसा मौका कभी नहीं मिलेगा। वैसे भी मैंने इसे अपने दिल में बसा लिया और साईं सच्चरित्र को पढ़ते हुए मैंने हँसते हुए स्वीकार किया कि हमें किसी भी भौतिक चीज़ के साथ लगाव नहीं होना चाहिए और बाबा की इच्छा को स्वीकार करना चाहिए। बाबा चाहते थे कि मैं उनके अनूठे तरीकों से इसे सीखूं। हम 5 1/2 घंटे के अंदर सुरक्षित रूप से बॉम्बे पहुंच गए (मेरी प्रार्थना के अनुसार)। मैंने कल साईं सच्चरित्र पढना समाप्त किया। मैं इस बात का उल्लेख करना भूल गई कि मेरी माँ ने भी बाबा की मूर्ति खरीदने के लिए रविवार की सुबह को अपने विचार व्यक्त किए थे। हम दोनों हँसे जब मैंने कहा, "मैं किताब की घटना के बाद पूरी तरह से भूल गई थी।" मंदिर से निकलने से पहले मैंने एक बाबा की मूर्ति और अपनी चाची के लिए दो अन्य पुस्तकें खरीदीं। यह मूर्ति कल शाम हमारे मंदिर में हमारे द्वारा स्थापित की गई। अंतिम अध्याय समाप्त होने के बाद मैंने भोग चड़ाया और आरती की और बाबा की प्यारी छोटी मूर्ति स्थापित की। इससे ज्यादा हमने बाबा को अपने दिलों में स्थापित किया।

इसलिए अब मैं यह कह सकती हूं कि बाबा ने हमारी सभी प्रार्थनाओं को स्वीकार किया और हमें प्रसाद भी दिया। आइए हम सभी प्रार्थनाओं के परिणाम को प्रद्धा भ्द्धि के साथ स्वीकार करें और अपने दिल, विचारों, शब्दों, कर्मों और कार्यों को बाबा के चरण कमलों में समर्पण करें। बाबा ही हमें सभी दुखों से मुक्त कराएँगे।

ओम् साईं राम, बाबा के चरणो में प्रणाम --- सबको शांति मिले।


© Sai Teri Leela - Member of SaiYugNetwork.com

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