Monday, November 25, 2019

साईं भक्त सकुंतला: बाबा ने मेरी समस्याओं का समाधान किया

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Sai Baba Solved My Problems - Experience of Sakuntala से अनुवाद

आज की पोस्ट पर आते हैं, यह साईं लीला पत्रिका से ली गई साईं बाबा की एक भक्त महिला का अनुभव है।
हम सभी अपने परिवार में साईं भक्त हैं। मैं मानसिक तनाव, अवसाद और शारीरिक बीमारियों से पीड़ित थी । डॉक्टरों ने मुझे मधुमेह और रक्तचाप के रोगी के रूप में डायग्नोस किया और मुझे सख्त आहार पर रखा। इससे मैं बीमारी से डरने लागि और मेरे मीठे पदार्थों के खाने पर नियंत्रण हो गया। अनिवार्य रूप से मैंने भगवान से पहले भीख मांगी।

कुछ मित्र, जो साईं बाबा के भक्त थे, ने मुझे श्रद्धा और सबुरी के साथ शिरडी जाने की सलाह दी।

किसी तरह मैंने कन्नड़ संस्करण में श्री साईं सतचरित्र की खरीदी की और प्रतिदिन एक अध्याय पढ़ा। मैं शिरडी जाने के लिए तरस गई; लेकिन साईं बाबा के 11 वचन के अनुसार, अप्रैल 1994 में ही बुलाया गई। जैसे ही मैं शिरडी में बस से नीचे उतरी, मेरा दिल खुशी से थिरकने लगा और मुझे पहला मुख दर्शन मिल गया।

अगले दिन काकड़ आरती में भाग लेने के बाद और बाबा से अपने अच्छे स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए बाबा से विनम्र निवेदन की। समाधि मंदिर और द्वारकामाई का दर्शन करने के बाद मैं एक वृद्ध महिला से मिली, जो मीठे पेड़े का प्रसाद रखी थी। इस तरह से मिठाई खाने की मेरी इच्छा उस सौम्य महिला द्वारा पूरी की जाने वाली बात पर मैं चकित रह गई। मैंने एक पेड़ा लिया और अपने पति से कहा कि वह खुद भी लेले। लेकिन, मुझे आश्चर्य हुआ जब उन्हे कोई भी बूढ़ी औरत पास मे नहीं मिली। साईं ने मेरे दुःख को समझा और मुझे एक वृद्ध औरत के रूप मे आकार पेड़ा प्रदान किया ।

इसके बाद हम सालाना शिरडी आते थे और नियमित रूप से उदी और प्रसाद ग्रहण करते थे ।

2003 में, मेरे घर पर काले बादल छा गए। मेरा छोटा बेटा, जो एक इंजीनियर है और हुबली में उपन खुद का निर्माण इकाई है, भारी नुकसान का सामना कर रहा था और परिणामस्वरूप ऋण के संबंध में कुछ अदालती मामले से जूझ रहा था ।

हमारे साईं बाबा मंदिर में नियमित पूजा और गुरुवार की यात्राओं के बावजूद, चीजें 2007 तक सबसे खराब थीं।

मैंने अक्टूबर 2007 मे कार्तिक अमावस्या के दौरान साईं बाबा सप्तहा का पालन करने का निर्णय लिया। पहला सप्तहा समाप्त होने के अगले दिन, एक बहुत ही युवा, सुंदर और आकर्षक साधु ने “साईं राम” कहते हुए मेरे द्वार पर दस्तक दी। उन्होंने कन्नड़ में बात की और मुझसे सामने वाले दरवाजे पर आने का अनुरोध किया, जो आमतौर पर बंद होता था जब मैं अकेली रहती थी। उसने फिर से मुझे बाहर आने और उसे एक नारियल और ग्यारह फूल देने का अनुरोध किया। मैंने झिझकते हुए दरवाजा खोला और उससे कहा कि नारियल और एक रुपया स्वीकार करें। उन्होंने मुझसे बार-बार अनुरोध किया कि इसे भगवान का आशीर्वाद मानें और शिरडी में गाय के घी का दीपक जलाएं, यह एक कार्तिक दिवस है। उन्होंने मुझे और मेरे घर को, मेरे परिवार के लिए एक उज्ज्वल भविष्य और अतीत, वर्तमान और भविष्य की सभी परेशानियों के अंत के लिए आशीर्वाद दिया। इसके बाद वह गायब हो गया और फिर कभी नहीं देखा गया।

मैंने यह पूरा प्रसंग अपने पति को सुनाया, जिन्होंने तुरंत ही आधा किलो गाय का घी शिरडी भेजने की व्यवस्था की, अगले दिन कार्तिक मास का अंतिम दिन और अमावस्या भी था । दो दिन बाद हम शिरडी से बाबा का प्रसाद पाकर बहुत खुश हुए। इसका मतलब था कि उन्होंने मुझे एक शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया था। मेरे पति एक भक्त मंडल के सदस्य हैं और अंग्रेजी-हिंदी 'श्री साई लीला' पत्रिका के एक योगदानकर्ता भी हैं। [line] Translated RamChandra Transliterated By Supriya


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